आयुर्वेद मै आकस्मिक चिकित्सा

हदयाधात कीअवस्था मै जब सीने मै असहनीय पीड़ा हो ,आसपास कोइ डाक्टर या अस्पताल आदि चिकीत्सीय सुविधा न हो अथवा इन सुविधाओ तक पहुचने मै बिलंब हो तब
समुचित चिकित्सा पहुचने तक उच्चश्वासाधात प्रयास लगाने से अत्यंत लाभ होता है ।
इस प्रयास मै जोर जोर से उच्चश्वास के साथ खासी ली जाती है । खासी इतनी तेज हो कि हर बार सीने से थूक निकले । जोर जोर से सास लेने से फेफड़ो मै प्राणवायु भरती है एवं खासी लेने से हदय सिकुड़ता है जिससे रक्त संचालन सामान्य हो जाता है । यह प्रक्रिया प्रत्येक दो सेकेन्ड के

आयुर्वेद एक समग्र चिकितसा पध्दति

आयुर्वेद अतिप्राचीन चिकित्सा पथ्दति है जिसे आज संपूर्ण विश्व मै मान्यता प्राप्त है आयुर्वेद मात्र औषधि चिकित्सा न होकर एक संपूर्ण स्वस्थ जीवन शैली हॅ । आयुर्वेदानुसार प्राकृतिक जीवन शैली अपनाने से शरीरगत् सप्तधातुआदि के पोषण एवं वात, पित्त, कफादि के समन्वय् से
शरीर उत्तम् स्वास्थ को प्राप्त करता है । इसके विपरित अप्राकृतिक जीवन शैलो का अनुसरण् करने से धातुगत छीणता एवं वात , पित्त, कफ मै बिषमता उत्पन्न होती है ।अधिक काल तक इन बिषमताओ के बने रहने से इनके शारिरिक व मानसिक

यौगिक ध्यान से लाभ

 यौगिक ध्यान से लाभ

महर्षि पतंजलि के योगसूत्र में ध्यान भी एक सोपान है।
चित्त को एकाग्र करके किसी एक वस्तु पर केन्द्रित कर देना ध्यान कहलाता है। प्राचीन काल में ऋषि मुनि भगवान का ध्यान करते थे। ध्यान की अवस्था में ध्यान करने वाला अपने आसपास के वातावरण को तथा स्वयं को भी भूल जाता है। ध्यान करने से आत्मिक तथा मानसिक शक्तियों का विकास होता है। जिस वस्तु को चित मे बांधा जाता है उस मे इस प्रकार से लगा दें कि बाह्य प्रभाव होने पर भी वह वहाँ से अन्यत्र न हट सके, उसे ध्यान कहते है।
ध्यान से लाभ
ऐसा पाया गया है कि ध्यान से बहुत से मेडिकल एवं मनोवैज्ञानिक लाभ होते हैं।

प्रत्येक वह व्यक्ति ज्ञान योगी है जो सोचना सीख गया है,

प्रत्येक वह व्यक्ति ज्ञान योगी है जो सोचना सीख गया है, विचार तो सबके भीतर होते हैं, लेकिन उन विचारों को एक दिशा देना हर किसी के बस की बात नहीं, दूसरी बात कि आपके भीतर विचार कौन से हैं? क्या कचरा किताबों के विचार? खुद के विचार या उधार के विचार? सोचता तो हर कोई है, लेकिन जो नये ढंग से सोचकर उसे कार्य रूप में परिणित कर देता है, विजेता वही कहलाता है।

 

मूलबन्ध

मूलबन्ध

बन्ध

मूलबन्ध --- मूल गुदा एवं लिङु -स्थान के रन्ध्र को बन्द करने का नाम मूलबन्ध है । वाम पाद की एडी को गुदा और लिङु के मध्यभाग में दृढ लगाकर गुदा को सिकोडकर योनिस्थान अर्थात् ‍ गुदा और लिङु एवं कन्द के बीच के भाग को दृढतापूर्वक संकोचन द्वारा अधोगत अपानवायु को बल के साथ धीरे -धीरे ऊपर की ओर है । अन्य आसनों के साथ एडी को सीवनी पर बिना लगाये हुए भी मूलबन्ध लगाया जा सकता है ।

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