आयुर्वेद मै आकस्मिक चिकित्सा

हदयाधात कीअवस्था मै जब सीने मै असहनीय पीड़ा हो ,आसपास कोइ डाक्टर या अस्पताल आदि चिकीत्सीय सुविधा न हो अथवा इन सुविधाओ तक पहुचने मै बिलंब हो तब
समुचित चिकित्सा पहुचने तक उच्चश्वासाधात प्रयास लगाने से अत्यंत लाभ होता है ।
इस प्रयास मै जोर जोर से उच्चश्वास के साथ खासी ली जाती है । खासी इतनी तेज हो कि हर बार सीने से थूक निकले । जोर जोर से सास लेने से फेफड़ो मै प्राणवायु भरती है एवं खासी लेने से हदय सिकुड़ता है जिससे रक्त संचालन सामान्य हो जाता है । यह प्रक्रिया प्रत्येक दो सेकेन्ड के
अन्तराल से अपनानी चाहिये जबतक धडकन सामान्य न हो जाए । धड़कन सामान्य हो जाने पर अपानवायु मुद्रा धारण कर
आग्नेय दिशा की ओर सिर कर के लेट जाना चाहिए ।
मिर्गी
जिस रोगी को बारंबार मिर्गी के दौरे आते हो उसके पास
स्वर्ण गैरिक (सोन गेरू) एवं धोड़ा वच समान मात्रा मै लेकर चूर्ण करके बंद डिब्बी मै रख देना चाहिए । दौरा आते ही डिब्बी खोलकर सुधाने से दौरा रूक जाता है । सामान्य अवस्था मै रौगी को दिन मै छह सात बार उक्त औषध का नस्य देने से दौरे नही आते ।

रक्तस्त्राव
ग्रीस्म काल मै पित्तादि कारणो से नाक ,मुह , गुदा , योनि आदि से
अचानक रक्त आने पर बोल बध्द रस की दो से चार गोली आयु एवं बलानुसार मिश्री ,मलाइ से देने पर रक्त स्त्राव रूक जाता है ।