प्राणायाम क्या है

प्राणायाम क्या है

'प्राणस्य आयाम: इत प्राणायाम'। ''श्वासप्रश्वासयो गतिविच्छेद: प्राणायाम''-(यो.सू. 2/49)
भावार्थ : अर्थात प्राण की स्वाभाविक गति श्वास-प्रश्वास को रोकना है।

योग के आठ अंगों में से चौथा अंग है प्राणायाम। प्राणायाम शब्द प्राण एवं आयाम दो शब्दों से मिलकर बना है /प्राण का अर्थ श्वास ,जीवन ,चैतन्य ,ऊर्जा एवं जीवनीशक्ति होता है / इस प्रकार प्राणायाम को श्वास का विज्ञान भी  कहा जा सकता है ./ सामान्यतः प्राणायाम को सांसों के नियन्त्रण करने की क्रिया के रूप में जाना जाता है / इस प्रकार प्राणायाम श्वास लेने की  सर्वोत्कृष्ट क्रिया है जिसके माध्यम से वायु हमारे फेफड़ों में प्रविष्ट होकर अतिरिक्त ऊर्जा का संचार करती है/ दूसरे शब्दों में प्राणायाम, प्राण अथवा जीवन ऊर्जा के विस्तार एवं नियन्त्रण की एक क्रिया के रूप में जानी जाती है / व्यक्ति जब जन्म लेता है तो गहरी श्वास लेता है और जब मरता है तो पूर्णत: श्वास छोड़ देता है। तब सिद्ध हुआ कि वायु ही प्राण है। आयाम के दो अर्थ है- प्रथम नियंत्रण या रोकना, द्वितीय विस्तार।

हम जब साँस लेते हैं तो भीतर जा रही हवा या वायु पाँच भागों में विभक्त हो जाती है या कहें कि वह शरीर के भीतर पाँच जगह स्थिर हो जाता हैं। ये पंचक निम्न हैं- (1)व्यान, (2)समान, (3)अपान, (4)उदान और (5)प्राण।

उक्त सभी को मिलाकर ही चेतना में जागरण आता है, स्मृतियाँ सुरक्षित रहती है। मन संचालित होता रहता है तथा शरीर का रक्षण व क्षरण होता रहता है। उक्त में से एक भी जगह दिक्कत है तो सभी जगह उससे प्रभावित होती है और इसी से शरीर, मन तथा चेतना भी रोग और शोक से ‍घिर जाते हैं। चरबी-माँस, आँत, गुर्दे, मस्तिष्क, श्वास नलिका, स्नायुतंत्र और खून आदि सभी प्राणायाम से शुद्ध और पुष्ट रहते हैं।

(1)व्यान : व्यान का अर्थ जो चरबी तथा माँस का कार्य करती है।
(2)समान : समान नामक संतुलन बनाए रखने वाली वायु का कार्य हड्डी में होता है। हड्डियों से ही संतुलन बनता भी है।
(3)अपान : अपान का अर्थ नीचे जाने वाली वायु। यह शरीर के रस में होती है।
(4)उदान : उदान का अर्थ उपर ले जाने वाली वायु। यह हमारे स्नायुतंत्र में होती है। 
(5)प्राण : प्राण वायु हमारे शरीर का हालचाल बताती है। यह वायु मूलत: खून में होती है।

प्राणायाम करते या श्वास लेते समय हम तीन क्रियाएँ करते हैं- 1.पूरक 2.कुम्भक 3.रेचक। इसे ही हठयोगी अभ्यांतर वृत्ति, स्तम्भ वृत्ति और बाह्य वृत्ति कहते हैं। अर्थात श्वास को लेना, रोकना और छोड़ना। अंतर रोकने को आंतरिक कुम्भक और बाहर रोकने को बाह्म कुम्बक कहते हैं।
     योगशास्त्र में प्राणायाम के निम्नलिखित चार सोपान वर्णित हैं :-
 (1)पूरक:- अर्थात नियंत्रित गति से श्वास अंदर लेने की क्रिया को पूरक कहते हैं। श्वास धीरे-धीरे या तेजी से दोनों ही तरीके से जब भीतर खिंचते हैं तो उसमें लय और अनुपात का होना आवश्यक है।
(2)कुम्भक:- अंदर की हुई श्वास को क्षमतानुसार रोककर रखने की क्रिया को कुम्भक कहते हैं। श्वास को अंदर रोकने की क्रिया को आंतरिक कुंभक और श्वास को बाहर छोड़कर पुन: नहीं लेकर कुछ देर रुकने की क्रिया को बाहरी कुंभक कहते हैं। इसमें भी लय और अनुपात का होना आवश्यक है।
(3)रेचक:- अंदर ली हुई श्वास को नियंत्रित गति से छोड़ने की क्रिया को रेचक कहते हैं। श्वास धीरे-धीरे या तेजी से दोनों ही तरीके से जब छोड़ते हैं तो उसमें लय और अनुपात का होना आवश्यक है।
   मानव शरीर में अन्नमय कोश ,मनोमय कोश ,प्राणमय कोश ,विज्ञानमय कोश ,एवं आनन्दमय कोश अन्तर्निहित होते हैं /शक्ति के सूक्ष्मतम रूप में वायु सर्वप्रमुख है /अतः हठयोग प्रदीपिका में  इसे उदान, अपान,समान ,प्राण ,तथा व्यान  पाँच श्रेणियों में विभक्त किया गया है /श्वास लेना  शरीर की एक महत्वपूर्ण क्रिया है क्योंकि जीवन श्वास से ही संचालित होता है /अतः यौगिक प्राणायाम यह प्रमाणित करता है कि मनुष्य जिस प्रकार और जितनी मात्रा  में साँस लेता है उतना ही प्रभाव प्रत्यक्ष रूप में शरीर एवं मन दोनों पर पड़ता है और यही प्रभाव ही मनुष्य के जीवन का निर्धारण करता है /  इस प्रकार प्राणायाम का प्रमुख उद्देश्य है फेफड़ों का पूर्ण उपयोग किया जाना और जीवनी शक्ति का अधिकाधिक संचय किया जाना /अधिक प्राण से शरीर की कोशिकाओं ,हड्डियों ,मांसपेशियों, रक्त एवं सामान्य स्वास्थ्य में सुधार होता है /प्राणायाम का दूसरा उद्देश्य है श्वास को धीरे धीरे लेना और उसके व्यवस्थित होने में सहायक होना /स्वामी सत्यानन्द जी का कथन है कि जो लोग श्वास तेजी से और अनियमित रूप से लेते हैं उनका शरीर एवं मन दोनों दुर्बल हो जाता है जिसके कारण वे घबराहट महशूस करते हैं / ऐसे लोगों की आयु भी कम हो जाती है /यौगिक श्वास क्रिया का तात्कालिक प्रभाव मन पर पड़ता है अर्थात धीरे धीरे श्वास लेने से चिंता एवं तनाव रहित होकर चित्त को एकाग्र करने में सहायता मिलती है /स्वामी शिवानन्द जी का कथन है "there is an intimate connection between the breath ,nerve currents and control of the inner prana or vital forces .prana becomes visible on the physical plane as motion and action ,and on the mental plane as thought .pranayam is the means by which a yogi tries to realize whithin his individual body the whole cosmic nature ,and attempts to attain perfection by attending all the powers of the univers ."
हठयोग एवं राजयोग में कुम्भक प्राणायाम पर विशेष बल दिया गया है किन्तु मेरा अपना मन्तव्य यह है कि सामान्य व्यक्ति अथवा बीमार व्यक्ति को कुम्भक कदापि नहीं करना चाहिए /कुम्भक क्रियाएं सिद्ध योगियों के लिए हैं जो प्राणायाम क्रिया में पारंगत होते हैं /सामान्य अथवा गृहस्थ व्यक्ति के लिए नाड़ीशोधन ,भ्रामरी ,शीतली प्राणायाम ही पर्याप्त हैं /१०-१५ सेकंड तक कुम्भक क्रिया करने में कोई हानि नहीं है किन्तु दीर्घ कुम्भक हेतु विशेष पात्रता होना अनिवार्य है /
प्राणायाम हेतु सामान्य निर्देश :-
योगशास्त्र में प्राणायाम हेतु अनेकानेक विधियों का वर्णन मिलता है किन्तु सामान्य एवं गृहस्र्थ व्यक्ति के लिए निम्नांकित बातों  पर विशेष ध्यान देना चाहिए :-
१- समय ;-प्राणायाम का समय प्रातः काल सूर्योदय के पूर्व अथवा सायंकाल सूर्यास्त के पश्चात का समय उपयुक्त माना गया है /
२- शारीरिक शुद्धता :- भोजन के आठ घंटे बाद खाली पेट अर्थात शौच क्रिया के पश्चात  स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनकर किया गया प्राणायाम उपयुक्त होता है किन्तु  विशेष परिस्थितियों में मल मूत्र त्याग करने के पश्चात् हाथ पैर धो करके भी इसे किया जा सकता है / 
 ३-भोजन :-शरीर में रक्त भोजन के सार तत्वों से निर्मित होता है /ग्रंथियां स्वस्थ और मजबूत रक्त से भोजन लेकर निर्मित होती हैं / मांस ,अंडे ,घी ,मक्खन ,मिठाइयाँ दैनिक भोजन में सम्मिलित नहीं होनी चाहिए / हल्का एवं सुपाच्य भोजन लेना चाहिए /फलों का अधिकाधिक उपभोग करना चाहिए /
४-   स्थान:- प्राणायाम के लिए उपयुक्त स्थान हरियाली युक्त पार्क ,छत अथवा खुली हुई बालकनी मानी गयी है /इसके अभाव में कमरे के अंदर दरवाजे एवं खिड़कियाँ खोलकर भी प्राणायाम कर सकते हैं किन्तु यह ध्यान रहे कि कमरा शीलनरहित,स्वच्छ एवं साफ़ होना चाहिए /